शुक्रवार, 11 जून 2010

चुभन-भाग ६

यह स्लिप राकेश नें ही दी थी और लिखा था......


" मुझे माफ़ कर देना नलिनी ,आभारी हूँ तुम्हारा की तुमने मुझे अच्छे प्यार की परिभाषा समझा कर मेरी जिन्दगी में एक नयापन ला दिया और मैं नए सिरे से प्यार के उस रूप की कल्पना करने लगा जिसको मैंने पहले कभी महसूस ही न किया था
अपनेपन के अहसास नें मेरा जीवन , सोच समझ सब बदल दिया था और अब मैं तुम्हें जिंदगी भर की खुशियां देना चाहता था , हर पल तुम्हारे साथ जी लेना चाहता था
मैं भी चाहता था , अपना छोटा सा खुशहाल परिवार , प्यारा सा घर और ढेर सारी खुशियाँ , नन्ही किलकारियों को सुनाने की हसरत मेरे मन में भी पनपने लगी थी , लेकिन जब तक मैं अपना यह सपना पूरा कर पाता तब तक बहुत देर हो चकी थी ।मुझे अचानक से पता चला कि मैं एच .आई.वी पाज़िटिव हूं । मैनें तुम्हारे और बच्चों के अस्पताल में बिना तुम्हें बताए सभी टैस्ट करवाए हैं , शुक्र है तुम तीनों पर इसका कोई प्रभाव नहीं है । मैनें बच्चों के नाम हम दोनों के नाम पर ही रिंकु और नीलु रखे हैं ।मैं नहीं चाहता कि मेरी परछाई भी इन मासूम बच्चों पर पडे । इसलिए मैं सब छोड-छाड कर जा रहा हूं , कहां ? मैं खुद नहीं जानता ।मैनें अपनी सारी प्रापर्टी बच्चों के नाम कर दी है और तुम पर पूरा भरोसा है कि तुम बच्चों की परवरिश अच्छे से करोगी । मैं अपने किए पर शर्मिन्दा हूँ , इस काबिल तो नहीं कि तुमसे माफी भी मांग सकूं फिर भी हो सके तो मुझे माफ़ कर देना
"

तुम्हारा

राकेश



यह पढकर अभी मैं इससे पहले कुछ सोच पाती कि चाय की ट्रे के साथ पडे अखबार पर नज़र पडी

राकेश कंस्ट्रक्शन कंपनी के मालिक की कार दुर्घटना में मौत.......।

उस दिन मुझ पर क्या गुजरी होगी , वो शब्दों में बता ही नहीं सकती । पता नहीं जिदगी मुझसे बार-बार इम्तिहान क्यों ले रही थी । क्यों मैं हर बार हार कर भी जीने पर मजबूर थी ? पहली बार राकेश नें जीने पर मजबूर किया तो अब की बार उस के बच्चों नें । मैं इतनी नासमझ तो नहीं थी , मुझे समझने में राकेश नें भी बहुत बड़ी भूल की थी , क्या मैं उसे अपनी भावनाओं का संबल न देती
काश ! उसनें नकारात्मक सोच न अपनाई होती तो मेरे बच्चों के सर पर आज भी बाप का साया होता और मुझे वैधव्य जीवन जीने को मजबूर न होना पड़ता
काश राकेश नें समझा होता कि वह भी एक आम इंसान की तरह जी सकता है , काश उसनें अपनी तकलीफ मुझसे बांटी होती तो हमारा जीवन आज कुछ और होता , पर अब यह सब बातें बस सोचने के लिए ही रह गयी थी , जो हर पल मुझे चुभती रहती हैं और मैं कुछ नहीं कर पाती
बस तब से मैंने अपनी जिंदगी का मकस्द बना लिया कि मैं एडस के प्रति जागरूक्ता अभियान चलाऊंगी । अपने सीने में दफ़न उस चुभन का अहसास मैं कभी कम न होने दूंगी । यही है मेरे अधूरे प्यार की चुभन को मेरी सच्ची श्रधांजलि ।



समाप्त

बुधवार, 9 जून 2010

चुभन- भाग ५

नलिनी को इस तरह फ़ूट-फ़ूट कर रोते हुए मैने पहली बार देखा था । अब मुझे अपनी बेवकूफ़ी का अहसास हुआ । मुझे नलिनी की व्यथा सुने बिना उससे इस तरह बात नहीं करनी चाहिए थी पर अब बोली हुई बात वापिस तो नहीं आ सकती थी ,मैने नलिनी को अपनी बाहों में भर लिया और वो थोडी देर यूंही मुझे चिपक कर रोती रही । न जाने कितने सालों से ये आंसु बह जाने को बेताब थे और मौका मिलते ही हर बांध तोड बह निकले । कुछ देर बाद नलिनी थोडा शांत हुई तो मैनें उसे आराम करने को कहा और कमरे से बाहर आ गई । शायद नलिनी के मन का बोज थोडा हल्का हो चुका था और उसे भी नींद आ गई । जब तक नलिनी सोई रही मैं उसी को लेकर परेशान होती रही । दो बार कमरे के अंदर झांक कर देखा कि कब जागे और कब मैं उसके बारे में आगे जान पाऊं । आखिर नलिनी के साथ ऐसा क्या हुआ होगा , यही सोच-सोच कर मैं बैचेन हुए जा रही थी । मैनें शाम की चाय बनाई और नलिनी के पास कमरे में ही ले गई । नलिनी जगी तो कुछ ताज़ा महसूस कर रही थी । मैं चाह कर भी एकदम से फ़िर क्या हुआ न पूछ पाई । थोडी इधर-उधर की बातें और फ़िर बातों ही बातों में मैने उसके स्वयं-सेविका बन यूं गली-गली में जाकर भाषण झाड्ने का कारण पूछ ही लिया । उसके चेहरे पर अजीब सी मुस्कान दौड गई ।बस नपे-तुले शब्दों में उत्तर दिया....

इससे मुझे मानसिक शान्ति मिलती है......और खामोश हो गई । उसकी खामोशी मेरे गले नहीं उतर रही थी ।

मैं उसके इस जवाब से संतुष्ट न थी और सीधा-सीधा राकेश के बारे में पूछने का साहस भी न जुटा पा रही थी ।नलिनी समझ गई कि मैं वास्तव में जानना क्या चाहती हूं । मैं ही नलिनी को समझ नहीं पा रही थी , वो तो मुझसे भलि-भांति परिचित थी ।थोडी खामोशी के बाद वह स्वयं बोलने लगी.......

तुम्हें पता है नैनां मेरे दो प्यारे-प्यारे बेटे हैं ,जुडवां हैं , बिल्कुल एक जैसे । शक्ल में राकेश की कार्बन कापी हैं , कहते-कहते नलिनी के चेहरे पर मां की ममता स्पष्ट झलक आई । मां कितना भी दुखी क्यों न हो , बच्चों की बात आते ही अनायास ही चेहरे पर मुस्कान और ममता उमड ही आती है । कुछ समय पहले जो नलिनी फ़ूट-फ़ूट कर मेरे सामने जिसके कारण रो रही थी ,वही नलिनी उसी के बच्चों के लिए सब कुछ भुला इस तरह मुस्कुरा रही थी कि मुझे उसका कोई रूप समझ ही नहीं आ रहा था । कोई इंसान इतने रूप कैसे बदल सकता है ।

अब मुझसे रहा न गया और मैनें पूछ ही लिया ...

क्या तुमनें राकेश से फ़िर कभी बात की .........।

नहीं..........।

क्यों .......?

मैं उस समय पेट से थी , हालत इतनी नाजुक थी कि कहीं आ जा नहीं सकती थी । मुझे देखने वाला कोई न था , एक मेरी काम वाली बाई के अलावा । तब से लेकर आज तक वही मेरा साथ निभा रही है । मैं आफ़िस जा नहीं सकती थी , राकेश को कई बार फ़ोन लगाया लेकिन कभी उसनें बात न की । मैं राकेश की नियत समझ चुकी थी लेकिन फ़िर भी एक बार उससे बात करना चाहती थी । अब राकेश के लिए मेरी भावनाएं खत्म हो चुकी थीं , मन में उसके प्रति नफ़रत बसने लगी थी और जिसके साथ नफ़रत हो जाए उसके साथ होने का भी कोई फ़ायदा नहीं , मैं बस एक बार उसको एक बार उसकी गलती का अहसास कराना चाहती थी , वो मौका मुझे कभी नहीं मिला । बच्चों के जन्म के बाद मैं दो महीने तक जिंदगी और मौत के बींच झूलती अस्पताल में रही । इस दौरान किसनें मेरा इलाज़ करवाया , बच्चों का सारा जरूरत का सामान कौन ले आया और क्यों ? मुझे कुछ पता न चला । ठीक होते ही मैनें अस्पताल में इलाज के खर्चे की बात की तो पता चला कि वो तो किसी नें पूरा का पूरा बिल चुका दिया है । मैं हैरान थी , ऐसा किसनें किया और क्यों लेकिन कुछ भी जान न पाई कि वो कौन है ? खैर मैं दोनों बच्चों को लेकर घर आ गई , और फ़ैसला किया कि अब तो मैं राकेश को कभी माफ़ करुंगी ही नहीं । तब मुझे बच्चे बोझ लगने लगे थे । सोचा था इन्हें राकेश के घर के बाहर फ़ैंककर उसके पाप को दुनिया के सामने लाऊंगी । इन्हीं उलझनों में उलझी मैं घर पहुंची , घर में मेरी काम वाली बाई नें मां के जैसा स्वागत किया । बच्चों को उसनें संभाल लिया और मैं रात भर सुबह होने का इंतज़ार करती रही कि आज तो किसी न किसी तरह मैं राकेश को बेनकाब करके ही छोडूंगी । बदले की आग में जलते हुए मुझे पूरी रात एक पल भी चैन न मिला । मैं सुबह-सुबह उठी और तैयार हो ही रही थी कि बाई चाय लेकर मेरे कमरे में आई । चाय के साथ-साथ उसनें मेरे हाथ में एक स्लिप भी थमा दी ,

ये स्लिप एक गाडी वाले साहब आए थे , उन्होंनें आपके घर आने पर आपको देने को कहा था ।

मैनें खोलकर देखा और मेरी आंखें फ़टी की फ़टी रह गईं ।

क्रमश:

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

चुभन - भाग ४

चुभन - भाग 1
चुभन - भाग 2
चुभन - भाग 3
मैं बस सुन रही थी , नलिनी बोलती जा रही थी , ऐसे जैसे वह कोई आप-बीती न कहकर कोई सुनी-सुनाई कहानी सुना रही हो । उसके चेहरे पर कोई भाव न थे , या फ़िर अपनी भावनाओं को उसनें हीनता के पर्दे से इस तरह ढक रखा था कि किसी की नज़र उस तक जा ही न पाए । क्या बिना किसी भाव के कोई अपनी बात कह सकता है , मैं सोचने पर विवश थी और नलिनी इसकी प्रवाह किए बिना बोलते जा रही थी ----
तीन दिन बाद राकेश मुझे अपनी गाडी मे घर से लेने आया । मैनें जाने से मना कर दिया तो राकेश नें भरोसा दिया कि यह राज हम दोनों के अलावा किसी और को कभी पता भी नहीं चलेगा । फ़िर कुछ दिनों में हम दोनों शादी कर लेंगे ।
लेकिन मेरा तो कोई भी नहीं और तुम्हारे घर वाले क्या हमारी शादी के लिए राजी होंगे ।
मैं हूं न फ़िर घर वालों को तो मैं मना ही लूंगा । पिताजी की अकेली संतान हूं , भला वो मेरी बात नहीं मानेंगे
तो किसकी मानेंगे ।
मैनें फ़िर से राकेश पर भरोसा कर लिया । कुछ दिन बाद उस रात का परिणाम सामने था मेरे पास मेरे अपने ही पेट में । कितनी बेबस थी मैं कि अपने ही शरीर से उस निशान को नहीं मिटा पा रही थी , जो हर पल मेरी आत्मा को घायल करता ।
मैं राकेश को शादी के लिए मनाने लगी और राकेश हर बार बात को टाल देता । मैं उसकी टाल-मटोल और नहीं सुन सकती थी , सो मैनें अबार्शन करवाने का फ़ैसला कर लिया तो राकेश नें मंदिर में ले जाकर मेरे गले में मंगलसूत्र और मांग में चुटकी सिन्दूर डाल सुहागिन होने का ठप्पा मेरे माथे पर लगा दिया ।
राकेश नें मुझसे मंदिर में भगवान को साक्षी मानकर शादी तो कर ली लेकिन यह बात तब तक छुपाकर रखने को कहा जब तक वह अपने पिताजी को हमारी शादी के लिए मना नहीं लेता । अब मैं भी बेफ़िक्र हो गई थी । भले ही किसी नें न देखा लेकिन मंदिर में बैठने वाला भगवान तो सबकुछ देखता है , यही हमें सिखाया गया था बचपन में और उसी भगवान भरोसे मैं राकेश को पति परमेश्वर मान चुकी थी और राकेश को अपनी जुबान बंद रखने का वादा भी किया था ।
मैनें अपना वादा निभाया भी , अपनी जुबान बंद रखी लेकिन उस पेट को कैसे छुपाती जो हर नए दिन के साथ नया रूप ले रहा था , मुझे देखते ही आफ़िस में कानाफ़ूसी शुरु हो जाती । धीरे-धीरे बात घर से निकल आफ़िस गली-मुहल्ले क्या पूरे शहर में फ़ैल चुकी थी और मैं इन सब बातों से अनजान ।
मुझे यह समझ नहीं आया कि राकेश का मैनें अपनी जुबान से कभी किसी के सामने जिक्र तक न किया था , फ़िर उसके साथ मेरे संबंधों की चर्चा फ़ैली कैसे ? क्या राकेश नें ही सबके सामने .....?
नहीं नहीं वो ऐसा नहीं कर सकता , स्वयं को ही तस्सली देने पर मजबूर थी । लेकिन दिन भर इतनी सारी शक्की निगाहों का सामना करते-करते मेरा विश्वास भी घायल होने लगा था और यह सब तब हुआ जब मैं बुरी तरह से फ़ंस चुकी थी , तीर मेरे हाथ से निकल चुका था । राकेश सांप बन कर मुझे डस चुका था और मैं खाली लकीर पीट्ने को मजबूर थी , इसके अलावा कोई चारा भी न था । अपनी ही बेवकूफ़ी पर आंसू बहा स्वयं पोछने पर मजबूर थी ।
पर तुम तो इतनी कमजोर न थी । जिसे देखकर कालेज में लडके आंख उठाकर देखने का साहस न करते थे , वह इतनी लाचार और बेबस कैसे हो सकती है ? तुम क्या हो ? यह अभी तक मै नहीं समझ पाई हूं ? तुम वो थी जो कालेज में बोल्ड गर्ल के नाम से जानी जाती थी या फ़िर ... ये हो कमजोर , लाचार , बेबस और अपनी मजबूरी का रोना रोने वाली ।
पता नहीं .....। मुझे उस से यह बनाने में मैं स्वयं जिम्मेदार हूं या फ़िर हालात ।
हालात का रोना क्यों रोती हो ? मुझेसे रहा न गया .... वह तो अपने बनाए होते हैं ? क्या तुम अंदर से इतनी कमजोर थी कि एक ही झटके से टूट गई , इस तरह कि तुम्हारा अपना कोई अस्तित्त्व ही नहीं रहा ? क्या हालात इंसान को इतना मजबूर कर सकते हैं कि बिना किसी सहारे अपने दम पर जी ही न सको ? क्या एक पढी-लिखी कमाऊ लडकी आत्म-निर्भर नहीं हो सकती ? क्या तुम्हारे पिताजी नें तुम्हें इसलिए पढाया कि तुम अपनी ही सोच में गिर जाओ , नहीं इसलिए पढाया कि तुम दुनिया का और किसी भी हालात का सामना समझदारी से कर सको । क्या तुम नहीं जानती थी कि दुनिया कितनी स्वार्थी है ? जब तुम्हारे अपने भाई पैसों की खातिर तुम्हारा साथ छोड गए तो फ़िर तुम उस इंसान पर कैसे भरोसा कर सकती हो , जिसे तुमने कभी जाना ही नहीं ? मैं बोलती जा रही थी । न जाने अब मुझे नलिनी पर दया नहीं गुस्सा क्यों आ रहा था ? और मैं यह भी भूल चुकी थी कि वह इस वक्त मन पर मनों बोझ लिए मेरे घर पर अपनी विश्वस्नीय सहेली के पास है । मैं भूल गई थी कि वर्षों से उसनें कितना कुछ अपने सीने में दफ़न कर रखा है , जो ज्वालामुखी बनकर फ़ूट जाना चाहता है और उसकी कुंठाग्रस्त भावनाएं लावा बनकर बह जाने के लिए हलचल मचा रही हैं । मेरे कुछेक शब्दों नें उस पर हथौडे सा प्रहार किया और वह फ़ूट-फ़ूट कर रोने लगी ।
क्रमश:

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

चुभन-भाग ३

चुभन-भाग 1
चुभन - भाग २

राकेश में न जाने ऐसा कौन सा आकर्षण था कि उसके सामने मेरी सारी समझ फ़ीकी पड जाती , मेरा आत्म-विश्वास मेरा साथ छोड जाता और उसकी हर बात के आगे मैं झुकती चली जाती । अब राकेश मुझे अपने साथ ले जाने लगा था और मैं तो थी ही आज़ाद परिन्दा , जिसके पर काट्ने वाला घर में कोई न था , जिसकी न तो किसी को फ़िक्र थी और न ही इंतज़ार । मैं कहां रहुं , कहां जाऊं , किससे संबंध रखुं किससे नही , इसकी परवाह किसी को न थी सो बिना कुछ विचार किए मैं राकेश के साथ बेझिझक जाने लगी । यह पारिवारिक व्यवस्था भी क्या चीज है , हम आज़ाद होते हुए भी आज़ाद नहीं होते , हर समय किसी न किसी का फ़िक्र , डर मन में समाया ही रहता है । हम आज़ाद पैदा हुए हैं तो हमें आज़ादी से जीने का अधिकार क्यों नहीं ? क्यों इतनी सारी बंदिशें हमें ऐसे घेरे रखती हैं कि हमारा अपना अस्तित्त्व ही नहीं रहता । लेकिन मैं तो आज़ाद थी फ़िर भी अंदर से किसी कोने से टीस उठती और उसे मैं दबा लेती । मैं तो आज़ाद हो चुकी थी फ़िर क्यों मैं जान-बूझ कर उस बंधन में फ़िर से बंधती जा रही थी । मुझे राकेश की फ़िक्र होने लगी थी ।
एक दिन रात के समय बरसात का मौसम और राकेश मेरे घर आ पहुंचा । यूं रात के समय राकेश का मुझे घर आना अच्छा तो न लगा लेकिन जब उसने बताया कि यहीं आस-पास उसकी गाडी खराब हो गई है और उसे घर जाने के लिए और कोई साधन नहीं मिला तो मैं उसे अंदर आने से मना न कर पाई । उसके कपडे भीग चुके थे । मैनें उसे पिताजी के पुराने कपडे पहनने को दिए और उन्हीं का कमरा राकेश को खोलकर दे दिया और अपने कमरे में सोने चली गई । मुझे नींद आ गई और नींद में ही मुझे अपने कमरे में किसी की आहट सुनाई दी । जब तक मैं कुछ समझ पाती राकेश नें अपना हाथ मेरे मुंह पर रख दिया और मैं चाह कर भी उसका विरोध न कर पाई । उसका स्पर्श मेरे अंतर्मन को घायल कर रहा था । मैं जानती थी कि जो हो रहा है गलत है ,मैं कैसे अपना कुंवारापन किसी के हाथों ऐसे ही सौंप दूं , लेकिन अपने मन की बात को न तो मैं जुबान पर ला पाई और न ही उसे अपने से दूर कर पाई । वह मुझे ऐसे निचोड रहा था जैसे अपनी किसी पुरानी कमीज़ को धोकर सुखाने के लिए डालना हो और मैं निचुड रही थी । पता नहीं अपना सबकुछ लुटा कर भी मुझे उस दिन नींद कैसे आ गई थी और सुबह जब आंख खुली तो राकेश जा चुका था ,अपनी शक्ल देखते हुए शर्म आ रही थी । मैं इतना कैसे गिर सकती हूं , लेकिन मैं तो गिर चुकी थी । ऐसा अनुभव हुआ कि रात की ऐसी कहानी जिसका और कोई गवाह न था ,मेरे अपने ही चेहरे पर लिखी हुई है और कोई भी उसे आसानी से पढ सकता है । पानी का नल खुला छोड जी भर रोई इतना कि शायद आंसुओं से मेरा पाप धुल जाए , शायद वो कलंक मिट जाए जिसे रात के स्याह अंधेरे में स्वयं अपने ही माथे लगा लिया था । दो-तीन दिन तक आफ़िस न गई कि कहीं मेरा भेद खुल ही न जाए । लेकिन कहते हैं न कि जिस चीज को ज्यादा दबाया जाए वह धमाके के साथ फ़ूटती है ।मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ । मैनें भी उस रात की कहानी को अपने सीने में दफ़न कर लिया लेकिन एक चिंगारी बम की भांति धमाका कर फ़ूटेगी ऐसा मैने न सोचा था ।

क्रमश:

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

चुभन - भाग २

चुभन - भाग 1

तुम तो जानती हो नैना , कालेज की पढाई पूरी करते ही मुझे अपने मां-पापा के पास वापिस जाना पडा था । एक दिन अचानक पिताजी हमें छोड चल बसे और मां इसी गम में जिन्दा लाश बन गई । छोटे दो भाईयों की जिम्मेदारी अचानक मुझ पर आन पडी । पिता जी का सपना था दोनों को डाक्टर बनाने का । मैं उनके इस सपने को हर हाल में पूरा करना चाहती थी । पिता जी की जो जमा पूंजी थोडी बहुत थी वह भाईयों के मैडिकल कालेज में दाखिले में खत्म हो चुकी थी । बीमार मां के ईलाज़ के लिए कुछ भी न बचा था । मैं निश्चय कर चुकी थी कि कभी हालात के आगे हार न मानुंगी । यही सोच मैं नौकरी की तलाश में निकल पडी और थोडे संघर्ष के बाद मुझे एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में नौकरी मिल गई । तनख्वाह इतनी थी कि घर का गुजारा अच्छा खासा चला सकूं और बीमार मां का ईलाज़ करवा सकूं । जिन्दगी आराम से कटने लगी । दोनों भाईयों नें मुंह मोड लिया , कभी मेरी और मां की तरफ़ झांका भी नहीं । कभी-कभी मैं स्वयं को ही उसके लिए दोषी मानती हूं कि शायद मैं ही बडी बहन होने के फ़र्ज़ नहीं निभा पाई और उन्हें अपनी पढाई के साथ-साथ अपने खर्च पूरे करने के लिए काम भी करना पडा । एक दिन मां भी मुझसे हमेशा के लिए रूठ गई और भरी पूरी दुनिया में मैं बिलकुल अकेली । कोई भी ऐसा न था जिसके कंधे पर मैं सर रख कर चार आंसु बहा सकूं । वही घर जहां पर हमारा बचपन हंसते खेलते बीता , जहां की हर चीज़ से मुझे लगाव था , वही अब अकेले खाने को दौडता । एक बार तो मैनें भी जीवन से हार मान ली और मन किया कि इस बेदर्द दुनिया में जीने से तो अच्छा है कि इससे इतनी दूर चली जाऊं जहां किसी दुनिया वाले की नज़र ही न पडे । जब मुझे किसी के भावनात्मक सहारे की जरूरत थी तब मेरे लिए भगवान बन कर आया - राकेश । राकेश हमारी कंपनी के मालिक का बेटा था । कभी-कभार उससे बातचीत होती थी लेकिन इतना अपनापन न था कि मैं उससे अपने दर्द बांटने लगूं । लेकिन वह वक्त ही ऐसा था कि मुझे सहारा चाहिए था । राकेश धीरे-धीरे मेरे दिल में कब बस गया , मुझे पता ही न चला । राकेश के बिना मुझे जीवन में अधूरापन लगने लगा । मैनें कभी उसके बारे में कुछ और जानने की कोशिश ही न की , बस सिवाय इतना कि वह हमारे बास का बेटा है , मुझे अपना मानता है । मैं जानना चाहती भी थी लेकिन अंदर से एक डर भी था कि कहीं मेरी कोई बात राकेश को बुरी लगी तो कहीं मुझे छोड ही न जाए । मैनें आंखें मूंद कर राकेश पर विश्वास कर लिया ।अंधी भक्ति , अंधी श्रद्धा और अंधा विश्वास कभी इंसान को सुख नहीं दे सकते । ईश्चर नें अपनी सबसे सुन्दर रचना मानव को बुद्धि शायद इसलिए ही दी है कि हम सोच-समझ कर कोई फ़ैसला ले सकें लेकिन जब किसी की आंखों पर पर्दा ही पड जाए तो बुद्धि तक नज़र जाती ही नहीं । मेरे भी दिलो-दिमाग में राकेश बस चुका था और मैं उसमें समाती जा रही थी ।

क्रमश:

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

चुभन - 1

उम्र लगभग पैंतीस , सुशिक्षित , नौकरी पेशा , दो बच्चों की मां , आदर्श पत्नी ,निम्न मध्यम वर्गीय , पारिवारिक , संस्कारों से सुसज्जित , हर कदम फ़ूंक-फ़ूंक कर रखने वाली , रात के काले स्याह तम में एकटक दीवार पर टंगी पुरानी तस्वीर को घूरती और सुबह होते ही जुट जाती एक ऐसे कार्य में , जो करने के बारे में कभी उसने सपने में भी न सोचा था । न तो जिसके बारे में उसे कोई समझ थी और न ही वह उसे समझना चाहती थी । लेकिन विधि की विडम्बना कि जिस कार्य से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता न था उसी को पूरे तन मन से अंजाम दे रही थी । इस बात से अंजान कि जो वह कर रही है , उसमें वह कभी सफ़ल हो भी पाएगी या नहीं लेकिन कहते हैं कि जब इरादे नेक हों और लगन सच्ची तो रास्ते आसान हो ही जाते हैं । नलिनी का मार्ग इतना आसान न था । वह जिस मार्ग पर तन्हा निकल पडी थी वह टेढा-मेढा , कांटों भरा और और हर कदम पर औरों के तानों के चुभने वाले शूल थे । जानती थी कि वह जिस पथ पर चल रही है उसकी कोई मंजिल दूर-दूर तक कहीं नज़र ही नहीं आती , फ़िर भी मन में संतोष था कि अगर वह दो-चार कदम भी नाप पाई तो एक नई राह तो दिखा ही देगी । बस चाह थी दूसरों के जीवन में नई रोशनी भरने की । दूसरों के जीवन में चन्द खुशियां भरने के लिए न जाने उसने कितनी बार अपने-आप को मारा और जब भी अपना बलिदान देती तो दुगुनी ताकत से फ़िर लडने को तैयार हो जाती । हर बार स्वयं मिट कर जो उसे संतुष्टि मिलती वही उसके जीने का आधार बन चुका था ।
नलिनी हमेशा चिंतन मग्न रहती । उसके दिमाग में हर समय कुछ न कुछ चलता ही रहता । वह एक कंस्ट्र्क्श्न कम्पनी में कार्यरत थी । स्वभाव से मिलनसार , हंसमुख नलिनी कभी किसी से ज्यादा बातचीत न करती । आजकल घर में उसने एक प्ले-होम खोल रखा है । आधा दिन तक प्ले-होम चलाती है फ़िर निकल पडती है अपने उद्देश्य को अंजाम देने । कभी चौपाल पर जाकर भाषण करती है , कभी महिलाओं को इक्कठा कर किसी नेता की सी नेतागिरी झाडती है तो कभी बच्चों को लेकर पैदल मार्च करते हुए निकल पडती है जागरूकता मुहिम पर । उसकी बात को कोई तमाशबीन चटखारे लेकर सुनते , कई अनसुना कर मुंह फ़ेर निकल जाते तो कई उसके मुंह पर ही बुरा-भला कह धिक्कारते ।किन्तु नलिनी इन सब बातों से बेप्रवाह बस बोलती रहती । अब तो नलिनी को देखते ही लोग भागने लगते , या फ़िर आंख बचा कर ऐसे भागते मानो उन्हें खाने के लिए कोई विशालकाय दैत्य उनके पीछे पडा हो । ऐसा नहीं कि नलिनी इन सब बातों से अंजान थी , सब जानती थी लेकिन फ़िर भी अपनी बात बताने की उस पर इतनी धुन स्वार थी कि और कुछ सुनना समझना उसके लिए बेमानी था ।
आज सुबह ही जब मेरी काम वाली बाई नें आकर मुझे बताया कि बाहर गली में कोई स्वयं सेविका आई है और आने-जाने वालों को रोक कर अपना भाषण झाड रही है तो मन में उत्सुक्ता जगी देखने की । बाहर निकल कर देखा तो सफ़ेद सूती साडी में लिपटी आकर्षक महिला को देखते ही उस तरफ़ खिंची चली गई । वह बोल रही थी और कुछ मनचले लडके बडे ध्यान से शरारती हंसी हंसते हुए सुन रहे थे ,वह बस बोलते जा रही थी । पास जाकर आवाज सुनी तो आवाज कुछ जानी पहचानी सी लगी । जब पास आकर चेहरा देखा तो अपनी आंखों पर भरोसा ही न हुआ । यह वही नलिनी थी या मेरा भ्रम । इतने सालों बाद और इस तरह नलिनी को देखकर मेरी क्या प्रतिक्रिया थी ,मुझे कैसा महसूस हुआ , मै खुद नहीं जानती लेकिन उसका बदला हुआ रूप देखकर मुझे झटका सा अवश्य लगा ।
मै नलिनी को वर्षों से जानती हूं । या यूं कहुं कि जन्म से जानती हूं तो गलत न होगा । हम दोनों बचपन की दोस्त हैं । साथ-साथ खेलना , कूदना , पढना और उम्र के एक पडाव में आकर दोनों के रास्ते अलग हो गए । नलिनी बहुत चुलबुली , दुबली-पतली और बचपन से ही आत्म-विश्वास भरपूर थी । जिस काम को करने की ठान लेती , वह कर के ही छोड्ती । चाहे कोई काम हो खेल या पढाई , नलिनी ने कभी हार मानना तो सीखा ही न था । मै हमेशा से उसकी हिम्मत और आत्म-विश्वास की प्रशंसक थी और अपने-आप में कभी-कभी आत्म-ग्लानि भी महसूस करती । इधर-उधर चहकती नलिनी जींस और टी-शर्ट में ऐसे चलती कि लडके भी उसकी तरफ़ आंख उठाकर देखने की हिम्मत न कर पाते । दोस्तों की दोस्त आजाद ख्याल नलिनी का व्यकित्व ऐसा कि कोई भी उससे प्रभावित हुए बिना न रह पाता ।मै नलिनी को अपने दिलो-दिमाग से कभी भुला नहीं पाई लेकिन अपनी जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे हम इतने व्यस्त भूल ही गए कि जिन्दगी हमें कहां से किस मोड पर ले आई है । कितना कुछ पीछे छोड आए हैं हम ।
नलिनी भी भला मुझे कैसे भूल सकती थी ? लेकिन उसने मुझे देखकर वो चंचलता और चपलता नहीं दिखाई जो उसके स्वभाव का हिस्सा थी । मै सोच भी नहीं सकती थी कि नलिनी इतनी सौम्य भी हो सकती है ।
मै उसे अपने घर ले गई । उसकी खातिरदारी में मैने कोई कसर न छोडी लेकिन तब तक उसका बदला हुआ रूप मुझे अंदर से कचोटता रहा , जब तक मैनें उससे पूछ न लिया । जवाब में नलिनी बोलते जा रही थी और मेरी सुनने की शक्ति जवाब दे रही थी । जो सुना वह रॊगटे खडे कर देने वाली दास्तां जिसका हर शब्द आत्मा को भी चीर कर उस गहराई तक प्रहार करता कि बेबस ही भद्दी सामाजिक व्यवस्था को छोडछाड कहीं भाग जाने को मन करता ।
क्रमश:

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

60 रुपये की चोरी -2

60 रुपये की चोरी -1

अब तक तो मुझे भी सुनैना की आदत हो चुकी थी , जब तक हर रोज उसके मुंह से उसकी बातें नहीं सुन लेती मुझे चैन ही न मिलता ।लेकिन वह अपने घर में व्यस्त होगी सोचकर मैनें भी दो-तीन दिन तक नहीं बुलाया ।मैं नहीं चाहती थी कि वह अपने सास-ससुर को छोड मेरे पास आकर बैठे । दो-तीन दिन बाद (जब उसके सास-ससुर चले गये)मेरे सामने खड़ी बस रो रही थी
मुझे उसके रोने का कोई कारण समझ न आया । मैने पूछा तो बोली
"दीदी शादी में जाते समय सासू माँ ने मुझे अपना पर्स दिया था और उसमे कुछ रुपये थे"

मुझे लगा शायद वह पर्स किसी ने छीन लिया, दिल्ली जैसे शहर में यह आम बात है

बोली "नहीँ दीदी !पर्स किसी ने नहीँ छीना मुझे जैसा उन्होने दिया था, वैसा ही मैने लौटा दिया मुझे अजन्मे बच्चे की
कसम मैने उसे नहीँ खोला"

कसम खा कर मानो वह अपनी सफाई देना चाह रही थी और रोए जा रही थी
बात अभी भी मेरी समझ से बाहर थी , लेकिन उसकी बात जानने की जितनी उत्सुक्ता थी , उससे कहीं ज्यादा मुझे उसका रोना परेशान कर रहा था । इतना हंसने खेलने वाली सुनैना को इस तरह गिडगिडा कर रोते हुए मैने पहली बार देखा था । जैसे-तैसे पानी पिलाया और थोडा चुप कराया तो फ़िर उसने बताया
"सासू माँ ने सबके सामने मुझे बहुत बेइज्जत किया, उसने सबके सामने पर्स खोला और उसमें से रुपये गिनने लगी "और मुझसे बोली
"इसमें 60 रुपये कम हैं, पर्स तुम्हारे पास था तुम्हीं ने चोरी की है और मेरे पक्ष में कोई कुछ नहीँ बोला, मैने जब राजीव
से कहा तो उसने भी मेरी बात सुनने की बजाय मुझ पर हाथ उठाया और कहा "मेरी माँ झूठ क्यों बोलेगी, की
होगी तुम्हीं ने चोरी"

उसका रोना तो बंद ही नहीँ हो रहा था और मेरी तरफ ऐसे देख रही थी जैसे कहना चाहती हो "दीदी क्या आपके पास है मेरी बेगुनाही का सबूत"
मैं उसे बेगुनाह साबित कर सकूँ , मेरे पास ऐसा कोई सबूत नहीँ था
कितनी ही देर तक वह मुझसे चिपक कर रोती रही थी उनका पारिवारिक मसला समझ कर मैने सुनैना को समझाया अवश्य लेकिन फ़िर कभी न मैने न सुनैना नें ही उस विषय पर बात की ।

कुछ दिन बाद ही हमने दिल्ली छोड़ दिया और फिर कभी सुनैना से बात नहीँ हुई कुछ दिन पूरव ही मुझे दिल्ली जाने का अवसर मिला ,
मेरे पास कुछ खाली समय था तो मैं सुनैना से मिलने गई
क्या यह वही सुनैना है या मेरी आंखों का धोखा ?नहीँ ! मुझे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीँ हो रहा था, केवल दो साल में ही वह कितना बदल गई है वह मुझे देख कर खुश तो हुई लेकिन वो झूठी खुशी ही लगी मुझे चेहरे पर नकली रौनक लाने का प्रयास कर रही थी कहाँ गई वो मासूमियत, खूबसूरती , आँखों की चमक और सपने ..............सब कुछ गायब था अपनी उम्र से कितनी ही बड़ी लग रही थी वो एक बहुत ही प्यारे से बच्चे को गोदी में लिए उसने मुझे फिर से इस तरह देखा मानो कहना चाह रही हो ............." दीदी मैं उस 60 रुपये की चोरी की सज़ा अब तक भुगत रही हूँ जो मैने कभी नहीँ की क्या आपके पास मेरी बेगुनाही का सबूत है"