बुधवार, 14 अप्रैल 2010

चुभन-भाग ३

चुभन-भाग 1
चुभन - भाग २

राकेश में न जाने ऐसा कौन सा आकर्षण था कि उसके सामने मेरी सारी समझ फ़ीकी पड जाती , मेरा आत्म-विश्वास मेरा साथ छोड जाता और उसकी हर बात के आगे मैं झुकती चली जाती । अब राकेश मुझे अपने साथ ले जाने लगा था और मैं तो थी ही आज़ाद परिन्दा , जिसके पर काट्ने वाला घर में कोई न था , जिसकी न तो किसी को फ़िक्र थी और न ही इंतज़ार । मैं कहां रहुं , कहां जाऊं , किससे संबंध रखुं किससे नही , इसकी परवाह किसी को न थी सो बिना कुछ विचार किए मैं राकेश के साथ बेझिझक जाने लगी । यह पारिवारिक व्यवस्था भी क्या चीज है , हम आज़ाद होते हुए भी आज़ाद नहीं होते , हर समय किसी न किसी का फ़िक्र , डर मन में समाया ही रहता है । हम आज़ाद पैदा हुए हैं तो हमें आज़ादी से जीने का अधिकार क्यों नहीं ? क्यों इतनी सारी बंदिशें हमें ऐसे घेरे रखती हैं कि हमारा अपना अस्तित्त्व ही नहीं रहता । लेकिन मैं तो आज़ाद थी फ़िर भी अंदर से किसी कोने से टीस उठती और उसे मैं दबा लेती । मैं तो आज़ाद हो चुकी थी फ़िर क्यों मैं जान-बूझ कर उस बंधन में फ़िर से बंधती जा रही थी । मुझे राकेश की फ़िक्र होने लगी थी ।
एक दिन रात के समय बरसात का मौसम और राकेश मेरे घर आ पहुंचा । यूं रात के समय राकेश का मुझे घर आना अच्छा तो न लगा लेकिन जब उसने बताया कि यहीं आस-पास उसकी गाडी खराब हो गई है और उसे घर जाने के लिए और कोई साधन नहीं मिला तो मैं उसे अंदर आने से मना न कर पाई । उसके कपडे भीग चुके थे । मैनें उसे पिताजी के पुराने कपडे पहनने को दिए और उन्हीं का कमरा राकेश को खोलकर दे दिया और अपने कमरे में सोने चली गई । मुझे नींद आ गई और नींद में ही मुझे अपने कमरे में किसी की आहट सुनाई दी । जब तक मैं कुछ समझ पाती राकेश नें अपना हाथ मेरे मुंह पर रख दिया और मैं चाह कर भी उसका विरोध न कर पाई । उसका स्पर्श मेरे अंतर्मन को घायल कर रहा था । मैं जानती थी कि जो हो रहा है गलत है ,मैं कैसे अपना कुंवारापन किसी के हाथों ऐसे ही सौंप दूं , लेकिन अपने मन की बात को न तो मैं जुबान पर ला पाई और न ही उसे अपने से दूर कर पाई । वह मुझे ऐसे निचोड रहा था जैसे अपनी किसी पुरानी कमीज़ को धोकर सुखाने के लिए डालना हो और मैं निचुड रही थी । पता नहीं अपना सबकुछ लुटा कर भी मुझे उस दिन नींद कैसे आ गई थी और सुबह जब आंख खुली तो राकेश जा चुका था ,अपनी शक्ल देखते हुए शर्म आ रही थी । मैं इतना कैसे गिर सकती हूं , लेकिन मैं तो गिर चुकी थी । ऐसा अनुभव हुआ कि रात की ऐसी कहानी जिसका और कोई गवाह न था ,मेरे अपने ही चेहरे पर लिखी हुई है और कोई भी उसे आसानी से पढ सकता है । पानी का नल खुला छोड जी भर रोई इतना कि शायद आंसुओं से मेरा पाप धुल जाए , शायद वो कलंक मिट जाए जिसे रात के स्याह अंधेरे में स्वयं अपने ही माथे लगा लिया था । दो-तीन दिन तक आफ़िस न गई कि कहीं मेरा भेद खुल ही न जाए । लेकिन कहते हैं न कि जिस चीज को ज्यादा दबाया जाए वह धमाके के साथ फ़ूटती है ।मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ । मैनें भी उस रात की कहानी को अपने सीने में दफ़न कर लिया लेकिन एक चिंगारी बम की भांति धमाका कर फ़ूटेगी ऐसा मैने न सोचा था ।

क्रमश:

3 टिप्‍पणियां:

  1. hmm kabhi kabhi virodh n kar pana bhi dukhdaayi hota hai
    magar ye sab ladkiyon mein koot koot kar bhara hota hai
    wo kabhi apni ichcha aniichcha nahi bata paati

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  2. अगले भाग का इंतज़ार है...
    कथा बांधे हुए है पूरी तरह...

    कुछ बातें...
    मसलन आज़ादी...इच्छा-अनिच्छा...कलंक...बलात्कार...या

    या फिर प्रेम....?

    एक अजीब सम्बन्ध....जिसे कितना भी अजीब नाम दिया जा सकता है....

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  3. माननीया सचदेवा जी!
    स्त्री हो या पुरुष हर "संवेदनशील" व्यक्ति के जीवन में सामाजिक मान्यताओं एवं लोकविरुद्ध हुई घटनाओं के प्रति अंर्तग्लानि होती है। उसे लेकर उसके मन में उहापोहों के गुबार उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। जब तक उसे अभिव्यक्ति का कोई रास्ता नहीं मिलता अंर्तव्यथा से मुक्ति नहीं मिल पाती है। व्यक्ति अंदर ही अंदर घुटता रहता है। ऐसे में अभिव्यक्ति ‘सेफ्टीवाल्व’ का काम करती है। इस मनोवैज्ञानिक का समस्या का आपने साहित्य के माध्यम से समाधान प्रस्तुत किया है। आपको बहुत...... बहुत...... साधुवाद!!
    -डॉ० डंडा लखनवी

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