गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

चुभन - भाग २

चुभन - भाग 1

तुम तो जानती हो नैना , कालेज की पढाई पूरी करते ही मुझे अपने मां-पापा के पास वापिस जाना पडा था । एक दिन अचानक पिताजी हमें छोड चल बसे और मां इसी गम में जिन्दा लाश बन गई । छोटे दो भाईयों की जिम्मेदारी अचानक मुझ पर आन पडी । पिता जी का सपना था दोनों को डाक्टर बनाने का । मैं उनके इस सपने को हर हाल में पूरा करना चाहती थी । पिता जी की जो जमा पूंजी थोडी बहुत थी वह भाईयों के मैडिकल कालेज में दाखिले में खत्म हो चुकी थी । बीमार मां के ईलाज़ के लिए कुछ भी न बचा था । मैं निश्चय कर चुकी थी कि कभी हालात के आगे हार न मानुंगी । यही सोच मैं नौकरी की तलाश में निकल पडी और थोडे संघर्ष के बाद मुझे एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में नौकरी मिल गई । तनख्वाह इतनी थी कि घर का गुजारा अच्छा खासा चला सकूं और बीमार मां का ईलाज़ करवा सकूं । जिन्दगी आराम से कटने लगी । दोनों भाईयों नें मुंह मोड लिया , कभी मेरी और मां की तरफ़ झांका भी नहीं । कभी-कभी मैं स्वयं को ही उसके लिए दोषी मानती हूं कि शायद मैं ही बडी बहन होने के फ़र्ज़ नहीं निभा पाई और उन्हें अपनी पढाई के साथ-साथ अपने खर्च पूरे करने के लिए काम भी करना पडा । एक दिन मां भी मुझसे हमेशा के लिए रूठ गई और भरी पूरी दुनिया में मैं बिलकुल अकेली । कोई भी ऐसा न था जिसके कंधे पर मैं सर रख कर चार आंसु बहा सकूं । वही घर जहां पर हमारा बचपन हंसते खेलते बीता , जहां की हर चीज़ से मुझे लगाव था , वही अब अकेले खाने को दौडता । एक बार तो मैनें भी जीवन से हार मान ली और मन किया कि इस बेदर्द दुनिया में जीने से तो अच्छा है कि इससे इतनी दूर चली जाऊं जहां किसी दुनिया वाले की नज़र ही न पडे । जब मुझे किसी के भावनात्मक सहारे की जरूरत थी तब मेरे लिए भगवान बन कर आया - राकेश । राकेश हमारी कंपनी के मालिक का बेटा था । कभी-कभार उससे बातचीत होती थी लेकिन इतना अपनापन न था कि मैं उससे अपने दर्द बांटने लगूं । लेकिन वह वक्त ही ऐसा था कि मुझे सहारा चाहिए था । राकेश धीरे-धीरे मेरे दिल में कब बस गया , मुझे पता ही न चला । राकेश के बिना मुझे जीवन में अधूरापन लगने लगा । मैनें कभी उसके बारे में कुछ और जानने की कोशिश ही न की , बस सिवाय इतना कि वह हमारे बास का बेटा है , मुझे अपना मानता है । मैं जानना चाहती भी थी लेकिन अंदर से एक डर भी था कि कहीं मेरी कोई बात राकेश को बुरी लगी तो कहीं मुझे छोड ही न जाए । मैनें आंखें मूंद कर राकेश पर विश्वास कर लिया ।अंधी भक्ति , अंधी श्रद्धा और अंधा विश्वास कभी इंसान को सुख नहीं दे सकते । ईश्चर नें अपनी सबसे सुन्दर रचना मानव को बुद्धि शायद इसलिए ही दी है कि हम सोच-समझ कर कोई फ़ैसला ले सकें लेकिन जब किसी की आंखों पर पर्दा ही पड जाए तो बुद्धि तक नज़र जाती ही नहीं । मेरे भी दिलो-दिमाग में राकेश बस चुका था और मैं उसमें समाती जा रही थी ।

क्रमश:

5 टिप्‍पणियां:

  1. उम्मीद रहेगी कि हैप्पी एंडिंग होगी........."

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  2. आपने जो धारावाहिक शुरू किया है उसकी दूसरी कड़ी दिसंबर के बाद अप्रैल में आई है ये तो मोहतरमा बहुत नाइंसाफी है|

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  3. dekh rahe hain...
    पूरे पांच महीने बाद अगला पार्ट आया है....
    अंदाजा लगा सकते हैं कि आप कितना व्यस्त होंगी....

    जल्द ही इस कहानी को पूरा कीजिएगा...

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  4. ऱोचक कहानी है अगली कडी की प्रतीक्षा है ।

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