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ज्योतिर्लोक

  ज्योतिर्लोक ज्योति बेटा, बाहर कचरे वाला आया है , ज़रा कचरादान तो बाहर रखदो। माँ, मेरे एग्जाम हैं और पढ़ रही हूँ , आप ही रख दो ना। हर समय पढ़ाई , पढ़ाई। कभी घर के काम में भी हाथ बंटा दिया कर। मैं अकेली क्या-क्या सम्भालूं। अभी खेतों में जाकर बुआई में भी हाथ बंटाना है। कहते-कहते माँ ने एक युवक के हाथ में कचरादान थमा दिया। माँ जी , अगर पानी मिल जाता तो रुको, अभी लाई युवक ने पानी पिया और एक आकर्षक सी मुस्कराहट के साथ आगे निकल लिया। न जाने क्यों माँ को वह युवक दूसरों से अलग दिखा। थोड़े दिन में माँ के मन में युवक के प्रति ममता जागने लगी। अब पानी के साथ-साथ चाय भी पूछी जाने लगी। युवक घर में झांकने लगा। और एक दिन ज्योति , ऊपर से सूखे कपडे उतार लाना नहीं तो बरसात में भीग जाएंगे। जी माँ झमझम बारिश और सारी फसलें तबाह। किसान की सारी की सारी मेहनत गयी मिट्टी में। परिवार में जैसे मातम का माहौल छा गया हो। युवक ने फिर से दरवाजे पर दस्तक दी। क्या हुआ माँ जी , आप कुछ परेशान दिख रही हैं। हाँ बेटा ,सोचा था , फसल अच्छी होगी, इस साल बेटी की पढ़ाई भी पूरी हो जाएगी तो उसके हाथ पीले कर गंगा नहा लेंगे , लेकिन कु...

भक्त के वश भगवान्

 भक्त के वश भगवान्   मेरा एक अनुभव " मुट्ठी में भगवान् " और दूसरा " भक्तों के बस में भगवान्' | जिसे मैं लिखने पर मजबूर हूँ | सोमवार दिनांक ०३-०४-२०२३ , समय सुबह ५:३० बजे | हम नहा धोकर कमरे से बाहर निकले ताकि सुबह-सुबह श्री राधा-वल्लभ जी की आरती के दर्शन हो जाएंगे | हमने बाहर निकलकर इस्कॉन मंदिर के पास एक ई-रिक्शा किया , जिसमें पहले से ही एक अधेड़ उम्र की औरत बैठी थी और बांके बिहारी जी के दर्शनार्थ निकली थी | वह मुम्बई से थी | बातचीत में उसने बताया  कि वह तीन  दिन से वृन्दावन में है और अपने बुजुर्ग माता-पिता को यात्रा करवाने आई है | कहते-कहते उसकी आँखें छलक आईं कि इतनी भीड़ के चलते वह बिहारी जी के दर्शन नहीं कर पाई और आज सुबह- सुबह इसलिए जा रही हूँ क्योंकि आज हमारी वापसी है और मैं देहरी पर प्रणाम करने अपनी हाजिरी लगाकर चली जाऊंगी, इतनी भीड़ में माता-पिता को नहीं ला सकती |  भीड़ वास्तव में बहुत  ज्यादा थी | इतने में बांके बिहारी जी मंदिर वाली गली में ई-रिक्शा वाले ने हमें यह कह कर उतार दिया कि इससे आगे वह नहीं जा पायेगा | सुबह का समय था और सोमवार को ...

मुट्ठी में भगवान् - स्व-अनुभव

  सौभाग्य से मुझे इस सप्ताह हमारे प्रिय कान्हा की नगरी वृन्दावन जाने का सुअवसर मिला। वह पावन धरती ही ऐसी है कि आप स्व आकर्षित हो ही जाते हैं। जो एक बार जाता है बस वहीं का होकर रह जाता है। क्यों ? ये तो वही मुरलीवाला ही जाने। वहां पर लोगों की भीड़ और श्रद्धा देखकर ऐसा लगा कि पूरा भारत बस यहीं बसता है।हजारों नहीं , लाखों लोगों की भीड़ वहां समा कैसे जाती है ? पता नहीं ! भक्ति भाव , समर्पण , विश्वास, त्याग, श्रद्धा का अनूठा संगम दिखता है इस नगरी में। मेरी माँ, जिसकी सदैव इच्छा होती है - वृन्दावन जाने की। कभी कहीं और जाने की बात ही नहीं करती और कभी हम बात करें भी तो उनका मन ही नहीं मानता। अभी हमारी छुट्टी चल रही है , माँ की इच्छा थी और हमारे कान्हा की कृपा तो हमने भी अपना बैग पैक कर लिया। भीड़ तो इतनी थी कि बस पूछिए ही मत और जो भाव था हर मन में , उसके लिए तो कोई शब्द हैं ही नहीं। हम भी भीड़-भाड़ को चीरते हुए आगे निकले। खैर , सोमवार ०३-०४-२०२३ को हमने वृन्दावन में बहुत सारे मंदिरों के दर्शन किये और आखिर में हम गोपेश्वर मंदिर पहुंचे।मंदिर में बस पुजारी जी थे और हम जैसे ही पहुंचे , मंदिर के द्व...

चुभन-भाग ६

यह स्लिप राकेश नें ही दी थी और लिखा था...... " मुझे माफ़ कर देना नलिनी ,आभारी हूँ तुम्हारा की तुमने मुझे अच्छे प्यार की परिभाषा समझा कर मेरी जिन्दगी में एक नयापन ला दिया और मैं नए सिरे से प्यार के उस रूप की कल्पना करने लगा जिसको मैंने पहले कभी महसूस ही न किया था अपनेपन के अहसास नें मेरा जीवन , सोच समझ सब बदल दिया था और अब मैं तुम्हें जिंदगी भर की खुशियां देना चाहता था , हर पल तुम्हारे साथ जी लेना चाहता था मैं भी चाहता था , अपना छोटा सा खुशहाल परिवार , प्यारा सा घर और ढेर सारी खुशियाँ , नन्ही किलकारियों को सुनाने की हसरत मेरे मन में भी पनपने लगी थी , लेकिन जब तक मैं अपना यह सपना पूरा कर पाता तब तक बहुत देर हो चकी थी ।मुझे अचानक से पता चला कि मैं एच .आई.वी पाज़िटिव हूं । मैनें तुम्हारे और बच्चों के अस्पताल में बिना तुम्हें बताए सभी टैस्ट करवाए हैं , शुक्र है तुम तीनों पर इसका कोई प्रभाव नहीं है । मैनें बच्चों के नाम हम दोनों के नाम पर ही रिंकु और नीलु रखे हैं ।मैं नहीं चाहता कि मेरी परछाई भी इन मासूम बच्चों पर पडे । इसलिए मैं सब छोड-छाड कर जा रहा हूं , कहां ? मैं खुद नहीं जानता ।...

चुभन- भाग ५

नलिनी को इस तरह फ़ूट-फ़ूट कर रोते हुए मैने पहली बार देखा था । अब मुझे अपनी बेवकूफ़ी का अहसास हुआ । मुझे नलिनी की व्यथा सुने बिना उससे इस तरह बात नहीं करनी चाहिए थी पर अब बोली हुई बात वापिस तो नहीं आ सकती थी ,मैने नलिनी को अपनी बाहों में भर लिया और वो थोडी देर यूंही मुझे चिपक कर रोती रही । न जाने कितने सालों से ये आंसु बह जाने को बेताब थे और मौका मिलते ही हर बांध तोड बह निकले । कुछ देर बाद नलिनी थोडा शांत हुई तो मैनें उसे आराम करने को कहा और कमरे से बाहर आ गई । शायद नलिनी के मन का बोज थोडा हल्का हो चुका था और उसे भी नींद आ गई । जब तक नलिनी सोई रही मैं उसी को लेकर परेशान होती रही । दो बार कमरे के अंदर झांक कर देखा कि कब जागे और कब मैं उसके बारे में आगे जान पाऊं । आखिर नलिनी के साथ ऐसा क्या हुआ होगा , यही सोच-सोच कर मैं बैचेन हुए जा रही थी । मैनें शाम की चाय बनाई और नलिनी के पास कमरे में ही ले गई । नलिनी जगी तो कुछ ताज़ा महसूस कर रही थी । मैं चाह कर भी एकदम से फ़िर क्या हुआ न पूछ पाई । थोडी इधर-उधर की बातें और फ़िर बातों ही बातों में मैने उसके स्वयं-सेविका बन यूं गली-गली में जाकर भाषण झाड्ने का...

चुभन - भाग ४

चुभन - भाग 1 चुभन - भाग 2 चुभन - भाग 3 मैं बस सुन रही थी , नलिनी बोलती जा रही थी , ऐसे जैसे वह कोई आप-बीती न कहकर कोई सुनी-सुनाई कहानी सुना रही हो । उसके चेहरे पर कोई भाव न थे , या फ़िर अपनी भावनाओं को उसनें हीनता के पर्दे से इस तरह ढक रखा था कि किसी की नज़र उस तक जा ही न पाए । क्या बिना किसी भाव के कोई अपनी बात कह सकता है , मैं सोचने पर विवश थी और नलिनी इसकी प्रवाह किए बिना बोलते जा रही थी ---- तीन दिन बाद राकेश मुझे अपनी गाडी मे घर से लेने आया । मैनें जाने से मना कर दिया तो राकेश नें भरोसा दिया कि यह राज हम दोनों के अलावा किसी और को कभी पता भी नहीं चलेगा । फ़िर कुछ दिनों में हम दोनों शादी कर लेंगे । लेकिन मेरा तो कोई भी नहीं और तुम्हारे घर वाले क्या हमारी शादी के लिए राजी होंगे । मैं हूं न फ़िर घर वालों को तो मैं मना ही लूंगा । पिताजी की अकेली संतान हूं , भला वो मेरी बात नहीं मानेंगे तो किसकी मानेंगे । मैनें फ़िर से राकेश पर भरोसा कर लिया । कुछ दिन बाद उस रात का परिणाम सामने था मेरे पास मेरे अपने ही पेट में । कितनी बेबस थी मैं कि अपने ही शरीर से उस निशान को नहीं मिटा पा रही थी , ज...

चुभन-भाग ३

चुभन-भाग 1 चुभन - भाग २ राकेश में न जाने ऐसा कौन सा आकर्षण था कि उसके सामने मेरी सारी समझ फ़ीकी पड जाती , मेरा आत्म-विश्वास मेरा साथ छोड जाता और उसकी हर बात के आगे मैं झुकती चली जाती । अब राकेश मुझे अपने साथ ले जाने लगा था और मैं तो थी ही आज़ाद परिन्दा , जिसके पर काट्ने वाला घर में कोई न था , जिसकी न तो किसी को फ़िक्र थी और न ही इंतज़ार । मैं कहां रहुं , कहां जाऊं , किससे संबंध रखुं किससे नही , इसकी परवाह किसी को न थी सो बिना कुछ विचार किए मैं राकेश के साथ बेझिझक जाने लगी । यह पारिवारिक व्यवस्था भी क्या चीज है , हम आज़ाद होते हुए भी आज़ाद नहीं होते , हर समय किसी न किसी का फ़िक्र , डर मन में समाया ही रहता है । हम आज़ाद पैदा हुए हैं तो हमें आज़ादी से जीने का अधिकार क्यों नहीं ? क्यों इतनी सारी बंदिशें हमें ऐसे घेरे रखती हैं कि हमारा अपना अस्तित्त्व ही नहीं रहता । लेकिन मैं तो आज़ाद थी फ़िर भी अंदर से किसी कोने से टीस उठती और उसे मैं दबा लेती । मैं तो आज़ाद हो चुकी थी फ़िर क्यों मैं जान-बूझ कर उस बंधन में फ़िर से बंधती जा रही थी । मुझे राकेश की फ़िक्र होने लगी थी । एक दिन रात के ...

चुभन - भाग २

चुभन - भाग 1 तुम तो जानती हो नैना , कालेज की पढाई पूरी करते ही मुझे अपने मां-पापा के पास वापिस जाना पडा था । एक दिन अचानक पिताजी हमें छोड चल बसे और मां इसी गम में जिन्दा लाश बन गई । छोटे दो भाईयों की जिम्मेदारी अचानक मुझ पर आन पडी । पिता जी का सपना था दोनों को डाक्टर बनाने का । मैं उनके इस सपने को हर हाल में पूरा करना चाहती थी । पिता जी की जो जमा पूंजी थोडी बहुत थी वह भाईयों के मैडिकल कालेज में दाखिले में खत्म हो चुकी थी । बीमार मां के ईलाज़ के लिए कुछ भी न बचा था । मैं निश्चय कर चुकी थी कि कभी हालात के आगे हार न मानुंगी । यही सोच मैं नौकरी की तलाश में निकल पडी और थोडे संघर्ष के बाद मुझे एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में नौकरी मिल गई । तनख्वाह इतनी थी कि घर का गुजारा अच्छा खासा चला सकूं और बीमार मां का ईलाज़ करवा सकूं । जिन्दगी आराम से कटने लगी । दोनों भाईयों नें मुंह मोड लिया , कभी मेरी और मां की तरफ़ झांका भी नहीं । कभी-कभी मैं स्वयं को ही उसके लिए दोषी मानती हूं कि शायद मैं ही बडी बहन होने के फ़र्ज़ नहीं निभा पाई और उन्हें अपनी पढाई के साथ-साथ अपने खर्च पूरे करने के लिए काम भी करना पडा । एक दिन...

चुभन - 1

उम्र लगभग पैंतीस , सुशिक्षित , नौकरी पेशा , दो बच्चों की मां , आदर्श पत्नी ,निम्न मध्यम वर्गीय , पारिवारिक , संस्कारों से सुसज्जित , हर कदम फ़ूंक-फ़ूंक कर रखने वाली , रात के काले स्याह तम में एकटक दीवार पर टंगी पुरानी तस्वीर को घूरती और सुबह होते ही जुट जाती एक ऐसे कार्य में , जो करने के बारे में कभी उसने सपने में भी न सोचा था । न तो जिसके बारे में उसे कोई समझ थी और न ही वह उसे समझना चाहती थी । लेकिन विधि की विडम्बना कि जिस कार्य से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता न था उसी को पूरे तन मन से अंजाम दे रही थी । इस बात से अंजान कि जो वह कर रही है , उसमें वह कभी सफ़ल हो भी पाएगी या नहीं लेकिन कहते हैं कि जब इरादे नेक हों और लगन सच्ची तो रास्ते आसान हो ही जाते हैं । नलिनी का मार्ग इतना आसान न था । वह जिस मार्ग पर तन्हा निकल पडी थी वह टेढा-मेढा , कांटों भरा और और हर कदम पर औरों के तानों के चुभने वाले शूल थे । जानती थी कि वह जिस पथ पर चल रही है उसकी कोई मंजिल दूर-दूर तक कहीं नज़र ही नहीं आती , फ़िर भी मन में संतोष था कि अगर वह दो-चार कदम भी नाप पाई तो एक नई राह तो दिखा ही देगी । बस चाह थी दूसरों के ...

60 रुपये की चोरी -2

60 रुपये की चोरी -1 अब तक तो मुझे भी सुनैना की आदत हो चुकी थी , जब तक हर रोज उसके मुंह से उसकी बातें नहीं सुन लेती मुझे चैन ही न मिलता ।लेकिन वह अपने घर में व्यस्त होगी सोचकर मैनें भी दो-तीन दिन तक नहीं बुलाया ।मैं नहीं चाहती थी कि वह अपने सास-ससुर को छोड मेरे पास आकर बैठे । दो-तीन दिन बाद (जब उसके सास-ससुर चले गये)मेरे सामने खड़ी बस रो रही थी मुझे उसके रोने का कोई कारण समझ न आया । मैने पूछा तो बोली "दीदी शादी में जाते समय सासू माँ ने मुझे अपना पर्स दिया था और उसमे कुछ रुपये थे" मुझे लगा शायद वह पर्स किसी ने छीन लिया, दिल्ली जैसे शहर में यह आम बात है बोली "नहीँ दीदी !पर्स किसी ने नहीँ छीना मुझे जैसा उन्होने दिया था, वैसा ही मैने लौटा दिया मुझे अजन्मे बच्चे की कसम मैने उसे नहीँ खोला" कसम खा कर मानो वह अपनी सफाई देना चाह रही थी और रोए जा रही थी बात अभी भी मेरी समझ से बाहर थी , लेकिन उसकी बात जानने की जितनी उत्सुक्ता थी , उससे कहीं ज्यादा मुझे उसका रोना परेशान कर रहा था । इतना हंसने खेलने वाली सुनैना को इस तरह गिडगिडा कर रोते हुए मैने पहली बार देखा था । जैसे-तैसे पानी...

60 रुपये की चोरी - 1

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बात लगभग अढाई साल पुरानी है , हम दिल्ली में थे हमारे साथ वाले फलैट में एक नव-विवाहित पति-पत्नी रहते थे, नये ही आए थे और अभी केवल चार-पाँच माँह पूरव ही शादी हुई थी हाथों में चमचमाता सफ़ेद- लाल रंग का चूडा , हरदम मेंहदी से रंगे हाथ , पैरों में पायल की छ्न-छन, कलियों सी नाजुक , फ़ूलों सी छटा बिखेरती , सुन्दर सी साडी में सजी सुनैना की शर्माती हुई कोमल सी मासूम आंखें अनायास ही किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेतीं । ईश्वर नें उसे रूप ही इतना सुन्दर दिया था कि कोई भी देखने वाला देखता ही रह जाता , और वह नव-विवाहित दुलहन आंखे झुका शर्म से जब हल्की सी मुस्कान चेहरे पर बिखेरती तो लगता कोई ताजा-ताजा कली चटक के फ़ूल अपना सौन्दर्य बिखेरने को बेताब है । उसके साथ एक अजीब सा रिश्ता बन गया था, वो मुझे दीदी कहती और मैं उसे सुनैना , क्योंकि उसकी आँखें बहुत खूबसूरत थी पति राजीव किसी कंपनी में कंप्यूटर इंजीनियर था और सुनैना भी अध्यापिका थी बहुत खुश रहते दोनों ही हम दोनों ड्यूटी से आने के बाद थोड़ा मन बहलाने के लिए बाहर सीढियों पर ही बैठ जाती और कितनी ही देर तक बातें करती सुनैना हरदम खुश रहती, आँखों में अजीब ...

बौना कद

बौना कद दुबला पतला शरीर , गोरा रंग ,चेहरे से झलकता आत्म-विश्वास ,साढे पाँच फुट कद , चाल ऐसी कि चले तो उसका कद वास्तविक से कहीं लम्बा लगता , असंभव शब्द जिसकी डायरी में कभी था ही नहीं ,हर समस्या का हल और हर कार्य में (चाहे घर हो या बाहर )सिद्धहस्त , उम्र लगभग तीस साल ,सॉफ्टवेयर इन्जीनियर की पत्नी और स्वयं प्राध्यापिका , एक कुशल गृहिणी के साथ-साथ सुधा एक ममतामयी माँ ( जिसकी आँखों में न जाने नन्हे कदमों से चलते अपने बेटे के भविश्य लिए कितने सपने समाए है ) स्वयं को सबसे समझदार समझती समझती भी क्यों न अब तक सबकुछ समझदारी से जो किया था और तीस साल की उम्र तक न जाने कितनी ही मुश्किलो को समझदारी से हल कर परिवार की समस्याओं का समाधान किया था यह केवल दिखावा नहीं था , वास्तव में स्वभाव ही ऐसा था ,इसीलिए सुधा को क्या मायका क्या ससुराल....हर जगह भरपूर प्यार मिला कहीं चार रिश्तेदार इक्कठे होते तो सुधा की समझदारी की चर्चा अवश्य होती जिसे सुनकर पहले मायके वालों का सीना चौडा होता था और शादी के बाद ससुराल वालों की छाती गर्व से फूल जाती सुधा को कभी अपने ऊपर घमंड नहीं हुआ और न ही कुछ अच्छा करके बार-बार जताने...

बिखरी जिन्दगी

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दीवार से सटी बैठी सुजाता हाथ मे बन्धी पट्टी को एक़ टक घूरती हुई जैसे सुन्न सी ही हो गई पट्टी बान्धते -बान्धते उसने पाँच साल के बेटे रोहन को पास बुलाया ,पर रोहन ने साफ इन्कार कर दिया रोहन के मुँह से इन्कार सुजाता की जिन्दगी की सबसे बडी हार थीआँखो से अविरल बहती अश्रुधारा के साथ अतीत की यादो मे खोई सुजाता की जिन्दगी कुछ ही पलो मे क्या से क्या हो गई ? कितनी खुश थी वह अनुज का साथ पाकर दोनो ही बचपन के दोसत , पडोसी और पारिवारिक सम्बन्ध भी बहुत अच्छे सुजाता के पिता जी के देहान्त के बाद वही लोग थे जिन्होने सुजाता और उसकी माँ को पारिवारिक सदस्य की भान्ति समझा था वरना दुनिया की भीड मे अकेली औरत छोटी सी बच्ची के साथ पूरी जिन्दगी का सफर ...........? अनुज और सुजाता इक्कठे खेलते कब बडे हो गए और यह बचपन की दोसती ने कब प्यार का रूप ले लिया , पता ही न चला कॉलेज की पढाई खत्म करने के बाद ही अनुज और सुजाता दोनो ही अपने - अपने काम मे व्यस्त हो गए सुजाताअध्यापिका और अनुज इन्जीनियर ,बहुत प्यारी जोडी थी दोनो की और किस्मत भी मेहरबान सबसे बडी बात यह कि किसी को भी उनके प्यार पर कोई एतराज ही न था कितनी आसानी से ...

अर्धांगिनी

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ऊँचा -लम्बा कद, साँवला रंग , छरहरा बदन, चुस्त-फुरत ,चले तो लगता है भागती है जल्दी-जल्दी से बर्तन घिसते हाथ , साथ में कभी कभी मीठी आवाज़ में गुनगुनाना( जो मैं कभी समझ नहीं पाती), साड़ी में लिपटी दुबली-पतली काया ,हाथ में मोबाइल, स्वयं को किसी राजकुमारी से कम नहीं समझती जी नहीं ! यह कोई और नहीं ,यह है शारदा बाई (मेरी काम वाली) जो अक्सर देरी से ही आती है और एक महीने में चार - पाँच छुट्टियां आराम से मार लेती है चतुर इतनी है कि जहाँ पर ध्यान नहीं दिया , वही पर काम में गड़बड़ी कर जाती हैउसकी इस आदत से मैं अक्सर परेशान रहती ही हूँ मैं ही नहीं वो भी मुझसे परेशान रहती है ,जब उसको मेरे सवालों का सामना करना पड़ता है दोनों ही एक दूसरे से परेशान है ,पर खुश भी है वो शायद इस लिए कि हम दोनों एक दूसरे की कमजोरी जानती है जब मुझे गुस्सा आता है तो शारदा बोलती ही नहीं ,बस मैं जो कहूँ ,चुपचाप कर देती है ,गुस्सा करके मुझे स्वयं को ग्लानि होती है न तो शारदा अपने में सुधार कर सकती है और न ही मैं अगर मैं यह कहूँ कि एक दूसरे को सहना हमारी आदत बन चुकी है ,या फिर मजबूरी है तो गलत नहीं होगा काम करवाना मेरी मजबूरी है...

लोअ लेवल विद्यार्थी

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आधुनिक शिक्षा प्रणाली का नया नियम अभिभावकों की खुशी देखो और विद्यालय की दुकानदारी चलाओ अटपटा लगा न सुनकर विद्यालय जिसको विद्या देवी का मन्दिर कहा जाता है , जहां से बडे-बडे महान लोग विद्या धन धन हासिल कर दुनिया को नई राह दिखाते हैं और जहां पर बिना किसी भेद-भाव के सबको बराबर समझा जाता है - उसके लिए दुकानदारी शब्द अखरेगा ही लेकिन सत्य तो यही है और सत्य कडवा होता है न चाह कर भी अपनाना पडता है आधुनिक शिक्षा प्रणाली में एक न्या अध्याय जुड गया है-अभिभावकों को खुश रखो और विद्यालय की दुकानदारी खूब चलाओ..... कहते कहते महेश की आंखें छलक आईं जो किस्मत और हालात के आगे कभी न हारा था , जिसने हर मुश्किल का सामना बहादुरी से किया और अपने बेटे तरुण से भी उसने यही अपेक्षा की थी क्या कुछ नहीं किया उसने एक बाप होने के नाते मध्यम वर्गीय परिवार से होकर और सीमित आय के बावजूद भी सपना था बेटे को इण्टरनैश्नल स्कूल में पढाना स्वयं तो सारी जिन्दगी पढाई में गाल दी न जाने दिन रात मेहनत करके किस तरह इन्जीनियरिंग की वो भी उस हालात में जब पिता का साया सर से उठ चुका था बीमार माँ और दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी अचानक ही...

मुखौटा

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खट्टी-मीठी यादों से मेरी बहुत सी यादें जुडी हैं , वो फिर कभी अवसर मिलते ही पोस्ट करुन्गी लेकिन पहले वो छोटी छोटी कहानियां/घटनाएं जिन्होंने मुझे लिखने पर मजबूर कर दिया मुखौटा मेट्रिक पास , उम्र लगभग सोलह साल ,बातों में इतनी कुशल कि बड़े-बड़ों मात दे जाए , साँवला रंग , दरमियान कद , दुबली-पतली,तेज़ आँखें , चुस्त - दुरुस्त, व्यक्तित्व ऐसा कि क्या डॉक्टर, क्या इन्जीनियर , क्या करोड़पति महिलाएं उसके इशारे पर नाचने को मजबूर हो जाती है बड़ी ही चालाकी से वह दूसरों के बाल काट देती है , केवल बाल ही नहीं काटती मुँह पर थपेड़े भी मारती है और किसी को बुरा भी नहीं लगता बल्कि इसके लिए मिलती है उसको अच्छी खासी मोटी रकम भी (जो वह किसी और के लिए होती है) कोई खुशी से देती है तो कोई मजबूरी में लेकिन देती सब है,जिसको वह अपनी उंगलियों पे नचाती है जिस तेज़ी के साथ चेहरे पर उसके हाथ चलते है उसी आत्म-विश्वास के साथ चलती है बालों में कैंची कभी वह अपनी गोदी में पैर रख कर बिना किसी भेद-भाव और नफरत के करती है दूसरों के पैरो और नाख़ुनों की सफाई और कभी उतनी ही ईमानदारी से करती है मालिश और साथ - साथ में चलती रहती है उसकी...