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चुभन - भाग २

चुभन - भाग 1 तुम तो जानती हो नैना , कालेज की पढाई पूरी करते ही मुझे अपने मां-पापा के पास वापिस जाना पडा था । एक दिन अचानक पिताजी हमें छोड चल बसे और मां इसी गम में जिन्दा लाश बन गई । छोटे दो भाईयों की जिम्मेदारी अचानक मुझ पर आन पडी । पिता जी का सपना था दोनों को डाक्टर बनाने का । मैं उनके इस सपने को हर हाल में पूरा करना चाहती थी । पिता जी की जो जमा पूंजी थोडी बहुत थी वह भाईयों के मैडिकल कालेज में दाखिले में खत्म हो चुकी थी । बीमार मां के ईलाज़ के लिए कुछ भी न बचा था । मैं निश्चय कर चुकी थी कि कभी हालात के आगे हार न मानुंगी । यही सोच मैं नौकरी की तलाश में निकल पडी और थोडे संघर्ष के बाद मुझे एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में नौकरी मिल गई । तनख्वाह इतनी थी कि घर का गुजारा अच्छा खासा चला सकूं और बीमार मां का ईलाज़ करवा सकूं । जिन्दगी आराम से कटने लगी । दोनों भाईयों नें मुंह मोड लिया , कभी मेरी और मां की तरफ़ झांका भी नहीं । कभी-कभी मैं स्वयं को ही उसके लिए दोषी मानती हूं कि शायद मैं ही बडी बहन होने के फ़र्ज़ नहीं निभा पाई और उन्हें अपनी पढाई के साथ-साथ अपने खर्च पूरे करने के लिए काम भी करना पडा । एक दिन...

चुभन - 1

उम्र लगभग पैंतीस , सुशिक्षित , नौकरी पेशा , दो बच्चों की मां , आदर्श पत्नी ,निम्न मध्यम वर्गीय , पारिवारिक , संस्कारों से सुसज्जित , हर कदम फ़ूंक-फ़ूंक कर रखने वाली , रात के काले स्याह तम में एकटक दीवार पर टंगी पुरानी तस्वीर को घूरती और सुबह होते ही जुट जाती एक ऐसे कार्य में , जो करने के बारे में कभी उसने सपने में भी न सोचा था । न तो जिसके बारे में उसे कोई समझ थी और न ही वह उसे समझना चाहती थी । लेकिन विधि की विडम्बना कि जिस कार्य से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता न था उसी को पूरे तन मन से अंजाम दे रही थी । इस बात से अंजान कि जो वह कर रही है , उसमें वह कभी सफ़ल हो भी पाएगी या नहीं लेकिन कहते हैं कि जब इरादे नेक हों और लगन सच्ची तो रास्ते आसान हो ही जाते हैं । नलिनी का मार्ग इतना आसान न था । वह जिस मार्ग पर तन्हा निकल पडी थी वह टेढा-मेढा , कांटों भरा और और हर कदम पर औरों के तानों के चुभने वाले शूल थे । जानती थी कि वह जिस पथ पर चल रही है उसकी कोई मंजिल दूर-दूर तक कहीं नज़र ही नहीं आती , फ़िर भी मन में संतोष था कि अगर वह दो-चार कदम भी नाप पाई तो एक नई राह तो दिखा ही देगी । बस चाह थी दूसरों के ...

60 रुपये की चोरी -2

60 रुपये की चोरी -1 अब तक तो मुझे भी सुनैना की आदत हो चुकी थी , जब तक हर रोज उसके मुंह से उसकी बातें नहीं सुन लेती मुझे चैन ही न मिलता ।लेकिन वह अपने घर में व्यस्त होगी सोचकर मैनें भी दो-तीन दिन तक नहीं बुलाया ।मैं नहीं चाहती थी कि वह अपने सास-ससुर को छोड मेरे पास आकर बैठे । दो-तीन दिन बाद (जब उसके सास-ससुर चले गये)मेरे सामने खड़ी बस रो रही थी मुझे उसके रोने का कोई कारण समझ न आया । मैने पूछा तो बोली "दीदी शादी में जाते समय सासू माँ ने मुझे अपना पर्स दिया था और उसमे कुछ रुपये थे" मुझे लगा शायद वह पर्स किसी ने छीन लिया, दिल्ली जैसे शहर में यह आम बात है बोली "नहीँ दीदी !पर्स किसी ने नहीँ छीना मुझे जैसा उन्होने दिया था, वैसा ही मैने लौटा दिया मुझे अजन्मे बच्चे की कसम मैने उसे नहीँ खोला" कसम खा कर मानो वह अपनी सफाई देना चाह रही थी और रोए जा रही थी बात अभी भी मेरी समझ से बाहर थी , लेकिन उसकी बात जानने की जितनी उत्सुक्ता थी , उससे कहीं ज्यादा मुझे उसका रोना परेशान कर रहा था । इतना हंसने खेलने वाली सुनैना को इस तरह गिडगिडा कर रोते हुए मैने पहली बार देखा था । जैसे-तैसे पानी...

60 रुपये की चोरी - 1

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बात लगभग अढाई साल पुरानी है , हम दिल्ली में थे हमारे साथ वाले फलैट में एक नव-विवाहित पति-पत्नी रहते थे, नये ही आए थे और अभी केवल चार-पाँच माँह पूरव ही शादी हुई थी हाथों में चमचमाता सफ़ेद- लाल रंग का चूडा , हरदम मेंहदी से रंगे हाथ , पैरों में पायल की छ्न-छन, कलियों सी नाजुक , फ़ूलों सी छटा बिखेरती , सुन्दर सी साडी में सजी सुनैना की शर्माती हुई कोमल सी मासूम आंखें अनायास ही किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेतीं । ईश्वर नें उसे रूप ही इतना सुन्दर दिया था कि कोई भी देखने वाला देखता ही रह जाता , और वह नव-विवाहित दुलहन आंखे झुका शर्म से जब हल्की सी मुस्कान चेहरे पर बिखेरती तो लगता कोई ताजा-ताजा कली चटक के फ़ूल अपना सौन्दर्य बिखेरने को बेताब है । उसके साथ एक अजीब सा रिश्ता बन गया था, वो मुझे दीदी कहती और मैं उसे सुनैना , क्योंकि उसकी आँखें बहुत खूबसूरत थी पति राजीव किसी कंपनी में कंप्यूटर इंजीनियर था और सुनैना भी अध्यापिका थी बहुत खुश रहते दोनों ही हम दोनों ड्यूटी से आने के बाद थोड़ा मन बहलाने के लिए बाहर सीढियों पर ही बैठ जाती और कितनी ही देर तक बातें करती सुनैना हरदम खुश रहती, आँखों में अजीब ...

बौना कद

बौना कद दुबला पतला शरीर , गोरा रंग ,चेहरे से झलकता आत्म-विश्वास ,साढे पाँच फुट कद , चाल ऐसी कि चले तो उसका कद वास्तविक से कहीं लम्बा लगता , असंभव शब्द जिसकी डायरी में कभी था ही नहीं ,हर समस्या का हल और हर कार्य में (चाहे घर हो या बाहर )सिद्धहस्त , उम्र लगभग तीस साल ,सॉफ्टवेयर इन्जीनियर की पत्नी और स्वयं प्राध्यापिका , एक कुशल गृहिणी के साथ-साथ सुधा एक ममतामयी माँ ( जिसकी आँखों में न जाने नन्हे कदमों से चलते अपने बेटे के भविश्य लिए कितने सपने समाए है ) स्वयं को सबसे समझदार समझती समझती भी क्यों न अब तक सबकुछ समझदारी से जो किया था और तीस साल की उम्र तक न जाने कितनी ही मुश्किलो को समझदारी से हल कर परिवार की समस्याओं का समाधान किया था यह केवल दिखावा नहीं था , वास्तव में स्वभाव ही ऐसा था ,इसीलिए सुधा को क्या मायका क्या ससुराल....हर जगह भरपूर प्यार मिला कहीं चार रिश्तेदार इक्कठे होते तो सुधा की समझदारी की चर्चा अवश्य होती जिसे सुनकर पहले मायके वालों का सीना चौडा होता था और शादी के बाद ससुराल वालों की छाती गर्व से फूल जाती सुधा को कभी अपने ऊपर घमंड नहीं हुआ और न ही कुछ अच्छा करके बार-बार जताने...

बिखरी जिन्दगी

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दीवार से सटी बैठी सुजाता हाथ मे बन्धी पट्टी को एक़ टक घूरती हुई जैसे सुन्न सी ही हो गई पट्टी बान्धते -बान्धते उसने पाँच साल के बेटे रोहन को पास बुलाया ,पर रोहन ने साफ इन्कार कर दिया रोहन के मुँह से इन्कार सुजाता की जिन्दगी की सबसे बडी हार थीआँखो से अविरल बहती अश्रुधारा के साथ अतीत की यादो मे खोई सुजाता की जिन्दगी कुछ ही पलो मे क्या से क्या हो गई ? कितनी खुश थी वह अनुज का साथ पाकर दोनो ही बचपन के दोसत , पडोसी और पारिवारिक सम्बन्ध भी बहुत अच्छे सुजाता के पिता जी के देहान्त के बाद वही लोग थे जिन्होने सुजाता और उसकी माँ को पारिवारिक सदस्य की भान्ति समझा था वरना दुनिया की भीड मे अकेली औरत छोटी सी बच्ची के साथ पूरी जिन्दगी का सफर ...........? अनुज और सुजाता इक्कठे खेलते कब बडे हो गए और यह बचपन की दोसती ने कब प्यार का रूप ले लिया , पता ही न चला कॉलेज की पढाई खत्म करने के बाद ही अनुज और सुजाता दोनो ही अपने - अपने काम मे व्यस्त हो गए सुजाताअध्यापिका और अनुज इन्जीनियर ,बहुत प्यारी जोडी थी दोनो की और किस्मत भी मेहरबान सबसे बडी बात यह कि किसी को भी उनके प्यार पर कोई एतराज ही न था कितनी आसानी से ...

अर्धांगिनी

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ऊँचा -लम्बा कद, साँवला रंग , छरहरा बदन, चुस्त-फुरत ,चले तो लगता है भागती है जल्दी-जल्दी से बर्तन घिसते हाथ , साथ में कभी कभी मीठी आवाज़ में गुनगुनाना( जो मैं कभी समझ नहीं पाती), साड़ी में लिपटी दुबली-पतली काया ,हाथ में मोबाइल, स्वयं को किसी राजकुमारी से कम नहीं समझती जी नहीं ! यह कोई और नहीं ,यह है शारदा बाई (मेरी काम वाली) जो अक्सर देरी से ही आती है और एक महीने में चार - पाँच छुट्टियां आराम से मार लेती है चतुर इतनी है कि जहाँ पर ध्यान नहीं दिया , वही पर काम में गड़बड़ी कर जाती हैउसकी इस आदत से मैं अक्सर परेशान रहती ही हूँ मैं ही नहीं वो भी मुझसे परेशान रहती है ,जब उसको मेरे सवालों का सामना करना पड़ता है दोनों ही एक दूसरे से परेशान है ,पर खुश भी है वो शायद इस लिए कि हम दोनों एक दूसरे की कमजोरी जानती है जब मुझे गुस्सा आता है तो शारदा बोलती ही नहीं ,बस मैं जो कहूँ ,चुपचाप कर देती है ,गुस्सा करके मुझे स्वयं को ग्लानि होती है न तो शारदा अपने में सुधार कर सकती है और न ही मैं अगर मैं यह कहूँ कि एक दूसरे को सहना हमारी आदत बन चुकी है ,या फिर मजबूरी है तो गलत नहीं होगा काम करवाना मेरी मजबूरी है...