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भक्त के वश भगवान्

 भक्त के वश भगवान्   मेरा एक अनुभव " मुट्ठी में भगवान् " और दूसरा " भक्तों के बस में भगवान्' | जिसे मैं लिखने पर मजबूर हूँ | सोमवार दिनांक ०३-०४-२०२३ , समय सुबह ५:३० बजे | हम नहा धोकर कमरे से बाहर निकले ताकि सुबह-सुबह श्री राधा-वल्लभ जी की आरती के दर्शन हो जाएंगे | हमने बाहर निकलकर इस्कॉन मंदिर के पास एक ई-रिक्शा किया , जिसमें पहले से ही एक अधेड़ उम्र की औरत बैठी थी और बांके बिहारी जी के दर्शनार्थ निकली थी | वह मुम्बई से थी | बातचीत में उसने बताया  कि वह तीन  दिन से वृन्दावन में है और अपने बुजुर्ग माता-पिता को यात्रा करवाने आई है | कहते-कहते उसकी आँखें छलक आईं कि इतनी भीड़ के चलते वह बिहारी जी के दर्शन नहीं कर पाई और आज सुबह- सुबह इसलिए जा रही हूँ क्योंकि आज हमारी वापसी है और मैं देहरी पर प्रणाम करने अपनी हाजिरी लगाकर चली जाऊंगी, इतनी भीड़ में माता-पिता को नहीं ला सकती |  भीड़ वास्तव में बहुत  ज्यादा थी | इतने में बांके बिहारी जी मंदिर वाली गली में ई-रिक्शा वाले ने हमें यह कह कर उतार दिया कि इससे आगे वह नहीं जा पायेगा | सुबह का समय था और सोमवार को ...

मुट्ठी में भगवान् - स्व-अनुभव

  सौभाग्य से मुझे इस सप्ताह हमारे प्रिय कान्हा की नगरी वृन्दावन जाने का सुअवसर मिला। वह पावन धरती ही ऐसी है कि आप स्व आकर्षित हो ही जाते हैं। जो एक बार जाता है बस वहीं का होकर रह जाता है। क्यों ? ये तो वही मुरलीवाला ही जाने। वहां पर लोगों की भीड़ और श्रद्धा देखकर ऐसा लगा कि पूरा भारत बस यहीं बसता है।हजारों नहीं , लाखों लोगों की भीड़ वहां समा कैसे जाती है ? पता नहीं ! भक्ति भाव , समर्पण , विश्वास, त्याग, श्रद्धा का अनूठा संगम दिखता है इस नगरी में। मेरी माँ, जिसकी सदैव इच्छा होती है - वृन्दावन जाने की। कभी कहीं और जाने की बात ही नहीं करती और कभी हम बात करें भी तो उनका मन ही नहीं मानता। अभी हमारी छुट्टी चल रही है , माँ की इच्छा थी और हमारे कान्हा की कृपा तो हमने भी अपना बैग पैक कर लिया। भीड़ तो इतनी थी कि बस पूछिए ही मत और जो भाव था हर मन में , उसके लिए तो कोई शब्द हैं ही नहीं। हम भी भीड़-भाड़ को चीरते हुए आगे निकले। खैर , सोमवार ०३-०४-२०२३ को हमने वृन्दावन में बहुत सारे मंदिरों के दर्शन किये और आखिर में हम गोपेश्वर मंदिर पहुंचे।मंदिर में बस पुजारी जी थे और हम जैसे ही पहुंचे , मंदिर के द्व...