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चुभन - भाग ४

चुभन - भाग 1 चुभन - भाग 2 चुभन - भाग 3 मैं बस सुन रही थी , नलिनी बोलती जा रही थी , ऐसे जैसे वह कोई आप-बीती न कहकर कोई सुनी-सुनाई कहानी सुना रही हो । उसके चेहरे पर कोई भाव न थे , या फ़िर अपनी भावनाओं को उसनें हीनता के पर्दे से इस तरह ढक रखा था कि किसी की नज़र उस तक जा ही न पाए । क्या बिना किसी भाव के कोई अपनी बात कह सकता है , मैं सोचने पर विवश थी और नलिनी इसकी प्रवाह किए बिना बोलते जा रही थी ---- तीन दिन बाद राकेश मुझे अपनी गाडी मे घर से लेने आया । मैनें जाने से मना कर दिया तो राकेश नें भरोसा दिया कि यह राज हम दोनों के अलावा किसी और को कभी पता भी नहीं चलेगा । फ़िर कुछ दिनों में हम दोनों शादी कर लेंगे । लेकिन मेरा तो कोई भी नहीं और तुम्हारे घर वाले क्या हमारी शादी के लिए राजी होंगे । मैं हूं न फ़िर घर वालों को तो मैं मना ही लूंगा । पिताजी की अकेली संतान हूं , भला वो मेरी बात नहीं मानेंगे तो किसकी मानेंगे । मैनें फ़िर से राकेश पर भरोसा कर लिया । कुछ दिन बाद उस रात का परिणाम सामने था मेरे पास मेरे अपने ही पेट में । कितनी बेबस थी मैं कि अपने ही शरीर से उस निशान को नहीं मिटा पा रही थी , ज...

चुभन-भाग ३

चुभन-भाग 1 चुभन - भाग २ राकेश में न जाने ऐसा कौन सा आकर्षण था कि उसके सामने मेरी सारी समझ फ़ीकी पड जाती , मेरा आत्म-विश्वास मेरा साथ छोड जाता और उसकी हर बात के आगे मैं झुकती चली जाती । अब राकेश मुझे अपने साथ ले जाने लगा था और मैं तो थी ही आज़ाद परिन्दा , जिसके पर काट्ने वाला घर में कोई न था , जिसकी न तो किसी को फ़िक्र थी और न ही इंतज़ार । मैं कहां रहुं , कहां जाऊं , किससे संबंध रखुं किससे नही , इसकी परवाह किसी को न थी सो बिना कुछ विचार किए मैं राकेश के साथ बेझिझक जाने लगी । यह पारिवारिक व्यवस्था भी क्या चीज है , हम आज़ाद होते हुए भी आज़ाद नहीं होते , हर समय किसी न किसी का फ़िक्र , डर मन में समाया ही रहता है । हम आज़ाद पैदा हुए हैं तो हमें आज़ादी से जीने का अधिकार क्यों नहीं ? क्यों इतनी सारी बंदिशें हमें ऐसे घेरे रखती हैं कि हमारा अपना अस्तित्त्व ही नहीं रहता । लेकिन मैं तो आज़ाद थी फ़िर भी अंदर से किसी कोने से टीस उठती और उसे मैं दबा लेती । मैं तो आज़ाद हो चुकी थी फ़िर क्यों मैं जान-बूझ कर उस बंधन में फ़िर से बंधती जा रही थी । मुझे राकेश की फ़िक्र होने लगी थी । एक दिन रात के ...

चुभन - भाग २

चुभन - भाग 1 तुम तो जानती हो नैना , कालेज की पढाई पूरी करते ही मुझे अपने मां-पापा के पास वापिस जाना पडा था । एक दिन अचानक पिताजी हमें छोड चल बसे और मां इसी गम में जिन्दा लाश बन गई । छोटे दो भाईयों की जिम्मेदारी अचानक मुझ पर आन पडी । पिता जी का सपना था दोनों को डाक्टर बनाने का । मैं उनके इस सपने को हर हाल में पूरा करना चाहती थी । पिता जी की जो जमा पूंजी थोडी बहुत थी वह भाईयों के मैडिकल कालेज में दाखिले में खत्म हो चुकी थी । बीमार मां के ईलाज़ के लिए कुछ भी न बचा था । मैं निश्चय कर चुकी थी कि कभी हालात के आगे हार न मानुंगी । यही सोच मैं नौकरी की तलाश में निकल पडी और थोडे संघर्ष के बाद मुझे एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में नौकरी मिल गई । तनख्वाह इतनी थी कि घर का गुजारा अच्छा खासा चला सकूं और बीमार मां का ईलाज़ करवा सकूं । जिन्दगी आराम से कटने लगी । दोनों भाईयों नें मुंह मोड लिया , कभी मेरी और मां की तरफ़ झांका भी नहीं । कभी-कभी मैं स्वयं को ही उसके लिए दोषी मानती हूं कि शायद मैं ही बडी बहन होने के फ़र्ज़ नहीं निभा पाई और उन्हें अपनी पढाई के साथ-साथ अपने खर्च पूरे करने के लिए काम भी करना पडा । एक दिन...