अर्धांगिनी

ऊँचा -लम्बा कद, साँवला रंग , छरहरा बदन, चुस्त-फुरत ,चले तो लगता है भागती है जल्दी-जल्दी से बर्तन घिसते हाथ , साथ में कभी कभी मीठी आवाज़ में गुनगुनाना( जो मैं कभी समझ नहीं पाती), साड़ी में लिपटी दुबली-पतली काया ,हाथ में मोबाइल, स्वयं को किसी राजकुमारी से कम नहीं समझती जी नहीं ! यह कोई और नहीं ,यह है शारदा बाई (मेरी काम वाली) जो अक्सर देरी से ही आती है और एक महीने में चार - पाँच छुट्टियां आराम से मार लेती है चतुर इतनी है कि जहाँ पर ध्यान नहीं दिया , वही पर काम में गड़बड़ी कर जाती हैउसकी इस आदत से मैं अक्सर परेशान रहती ही हूँ मैं ही नहीं वो भी मुझसे परेशान रहती है ,जब उसको मेरे सवालों का सामना करना पड़ता है दोनों ही एक दूसरे से परेशान है ,पर खुश भी है वो शायद इस लिए कि हम दोनों एक दूसरे की कमजोरी जानती है जब मुझे गुस्सा आता है तो शारदा बोलती ही नहीं ,बस मैं जो कहूँ ,चुपचाप कर देती है ,गुस्सा करके मुझे स्वयं को ग्लानि होती है न तो शारदा अपने में सुधार कर सकती है और न ही मैं अगर मैं यह कहूँ कि एक दूसरे को सहना हमारी आदत बन चुकी है ,या फिर मजबूरी है तो गलत नहीं होगा काम करवाना मेरी मजबूरी है...