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मार्च, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अर्धांगिनी

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ऊँचा -लम्बा कद, साँवला रंग , छरहरा बदन, चुस्त-फुरत ,चले तो लगता है भागती है जल्दी-जल्दी से बर्तन घिसते हाथ , साथ में कभी कभी मीठी आवाज़ में गुनगुनाना( जो मैं कभी समझ नहीं पाती), साड़ी में लिपटी दुबली-पतली काया ,हाथ में मोबाइल, स्वयं को किसी राजकुमारी से कम नहीं समझती जी नहीं ! यह कोई और नहीं ,यह है शारदा बाई (मेरी काम वाली) जो अक्सर देरी से ही आती है और एक महीने में चार - पाँच छुट्टियां आराम से मार लेती है चतुर इतनी है कि जहाँ पर ध्यान नहीं दिया , वही पर काम में गड़बड़ी कर जाती हैउसकी इस आदत से मैं अक्सर परेशान रहती ही हूँ मैं ही नहीं वो भी मुझसे परेशान रहती है ,जब उसको मेरे सवालों का सामना करना पड़ता है दोनों ही एक दूसरे से परेशान है ,पर खुश भी है वो शायद इस लिए कि हम दोनों एक दूसरे की कमजोरी जानती है जब मुझे गुस्सा आता है तो शारदा बोलती ही नहीं ,बस मैं जो कहूँ ,चुपचाप कर देती है ,गुस्सा करके मुझे स्वयं को ग्लानि होती है न तो शारदा अपने में सुधार कर सकती है और न ही मैं अगर मैं यह कहूँ कि एक दूसरे को सहना हमारी आदत बन चुकी है ,या फिर मजबूरी है तो गलत नहीं होगा काम करवाना मेरी मजबूरी है...

लोअ लेवल विद्यार्थी

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आधुनिक शिक्षा प्रणाली का नया नियम अभिभावकों की खुशी देखो और विद्यालय की दुकानदारी चलाओ अटपटा लगा न सुनकर विद्यालय जिसको विद्या देवी का मन्दिर कहा जाता है , जहां से बडे-बडे महान लोग विद्या धन धन हासिल कर दुनिया को नई राह दिखाते हैं और जहां पर बिना किसी भेद-भाव के सबको बराबर समझा जाता है - उसके लिए दुकानदारी शब्द अखरेगा ही लेकिन सत्य तो यही है और सत्य कडवा होता है न चाह कर भी अपनाना पडता है आधुनिक शिक्षा प्रणाली में एक न्या अध्याय जुड गया है-अभिभावकों को खुश रखो और विद्यालय की दुकानदारी खूब चलाओ..... कहते कहते महेश की आंखें छलक आईं जो किस्मत और हालात के आगे कभी न हारा था , जिसने हर मुश्किल का सामना बहादुरी से किया और अपने बेटे तरुण से भी उसने यही अपेक्षा की थी क्या कुछ नहीं किया उसने एक बाप होने के नाते मध्यम वर्गीय परिवार से होकर और सीमित आय के बावजूद भी सपना था बेटे को इण्टरनैश्नल स्कूल में पढाना स्वयं तो सारी जिन्दगी पढाई में गाल दी न जाने दिन रात मेहनत करके किस तरह इन्जीनियरिंग की वो भी उस हालात में जब पिता का साया सर से उठ चुका था बीमार माँ और दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी अचानक ही...